शनिवार, 29 मई 2010

सपनो में मिली



कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

कभी फूलों की तरह खिली  
कभी मुस्कुराई  सी रहती
कभी शरमाई सी 
और कबी मुरझाई सी

कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

कभी सुबह को आँखें मलती  
कभी सुस्ती में सहलाती  
कभी जमाई में अंगड़ाई लेती
और कभी कर्वट बदलती

कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

थोडा सहमी थी कभी
थोडा रूकती थी कभी
कभी डर कर कदम थाम लेती
थोड़ी रुक कर राह पहचान लेती

कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

सुबह की किरणों सी चमकती 
सूरज की रौशनी सी दमकती
शीतल हवावाओं सी लहराती
मस्त बेलों सी बल खाती

कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

कभी फसलों सी लहराती 
कभी कलियों मुस्काती
कभी गुंचों सी खिलती 
कभी ओस सी चमचमती

कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

कभी बादलों सी गरजती
कभी टिमटिम बरसती
कभी क्षितिज को चमकाती 
कभी इन्द्रधनुषी रंगों से 
आकाश को भर जाती

कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

कभी समेटती हुई अपने तप को 
पश्चिम में लाली बिखराती
चन्द्र की शीतलता को फैलती 
सितारों की चादर बिछाती  

कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

नैनो की लाली को छुपाती
चक्शों को मुंदती जाती 
निद्रा की डोली में 
सजिया पे दुल्हन सी सो जाती

ऐसे ही 
कई बार यूं ही 
ज़िन्दगी
मुझे सपनो में मिली