मंगलवार, 30 नवंबर 2010

तुम बहुत करीब हो 
मगर पास नहीं
तुम्हें देख सकते हैं 
मगर छूने का अहसास नहीं
तुम बहुत करीब हो 
मगर पास नहीं
माना के हर कतरे में
हो तुम एक समुन्दर की तरह
माना के हर कतरे में
हो तुम एक समुन्दर की तरह
पर समुन्दर से बुझती कभी
प्यास नहीं
तुम बहुत करीब हो 
मगर पास नहीं
दर्द की दीवारों से 
घिरा है अंजुमन
दर्द की दीवारों से 
घिरा है अंजुमन
तोड़ पाएं इन दीवारों को 
हमें आस नहीं
तुम बहुत करीब हो 
मगर पास नहीं
दिल कहाँ और 
नसीब कहाँ
दिल कहाँ और 
नसीब कहाँ 
कभी मिल पायेगा मुकद्दर
है अहसास नहीं 
तुम बहुत करीब हो 
मगर पास नहीं
नज़दीक गर न आ 
पाए कभी
नज़दीक गर न आ
पाए कभी
देख कर दूर से सजदा करें 
यही आभास सही
तुम बहुत करीब हो 
मगर पास नहीं

शनिवार, 20 नवंबर 2010

ये उनकी ख्वाहिश की  

हम पे तब्बजू भी ना दें

ये हमारा शौक की

हम उनका रास्ता रोक लें

इश्क है तो जुबां से कह दें

और नहीं तो

कदम हम पर रख कर चल दें

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

पञ्च तत्व

मुझे सीखना है 
बागों के उन गुलाबों की तरह महकना
सूरज मुखी की तरह मुस्काना 
खलिहानों की तरह हरियाली बिखेरना
वृक्षों की तरह छाँव देना 

मुझे सीखना है 
चिड़ियों की तरह मधुर वाणी में गाना 
पखेरू की तरह हवा की लहर सा उड़ जाना
हवा की तरह शीत लगर फैलाना
बादल की तहर मंडराना

मुझे सीखना है
सूरज की तरह तेज बिखराना
चंद्रमा की तरह अँधियारा को उज्जवल करना 
तारों की तरह टिमटिमाना
आकाश की तरह छा जाना

मुझे सीखना है
बूंदों की तरह चमकना 
झरनों की तरह रस बरसना 
नदिया की तरह बहे जाना
सागर की तरह गहरा होना

मुझे सीखना है 
बगीचों की तरह फल देना 
खेतों में बोये बीजों की तरह नव जीवन उगाना
जंगलों की तरह हरा भरा हो जाना
धरती की तरह अपनी गोद में सब को सुलाना

मुझे सीखना है 
दिशाओं की तरह रास्ता दिखाना
राहों की तरह मंजिल पे पहूंचना
शिखरों की तरह बुल्लंद होना
हिमनद की तरह शांत सोना

मुझे सीखना है 
तुम्हारे अस्तित्व से अपने अस्तित्व को उबरना
पञ्च तत्वों से जीवन को संवारना
अपने सत्य को पहचान पाना
जीवन के हर उपहार को सराहना

मुझे सीखना है 
हर उस मद से जो तुम्हारी रचना है
हर जीव, जयन्तु, 
हर जल, थल, पृथ्वी और आकाश से
हर तेज और हर प्रकाश से

ये ही हैं जीवन का सार
जो मेरे जीवन को जीव योग्य बना सकते हैं.
और मुझे पुन: तुम से मिला सकते हैं.

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

DHOKHA

कसमें वादे प्यार वफ़ा
सब धोखे हैं ज़िंदगी के
इन धोखों को देना धोखा ही है ज़िंदगी
जो दे न पाए धोखा इन धोखों को 
मांगता है मौत वो ही
धोखे छोड़ नहीं देते उसे मौत के बाद
आखिर मौत भी तो है धोखा ही.

सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

नव पथ

इस गली से आगे एक पथ ढूँढा  है
वहां हरी  भरी घांस  के बीच सदा बहार के फूल  मुस्काते हैं 
सूर्य की लाली से जहां आकाश चमक जाता   है 
चिड़ियों की चहचाहट से जहाँ सुबह गाती  है 

इस गली से आगे एक पथ ढूँढा  है

जहाँ वृक्षों की  शायं शायं मधुर ध्वनि सुनाती है.
जहाँ कोमल हवा हृदय  को शीतल कर जाती है 
जहाँ पखेरू स्वतंत्र आकाश में उड़ पाते  हैं 
जहाँ पथ के कोनों पर सिर्फ फूल नज़र आते हैं

इस गली से आगे एक पथ ढूँढा  है

चलो छोड़ चलें इस गली को जहां 
धुंए की कालिख दृष्टि को धुंधलाती है 
अँधेरी गलियों में रोज़ ठोकर लग जाती है 
फूलों की जगह  जहां  उपकरण दर्शाते हैं 
पखेरू जहाँ कीटों में नज़र आते हैं 
शोर जहां सरगम कहलाता है
चलो छोड़ चलें इस गली को 

इस गली से आगे एक पथ ढूँढा  है

छोटे छोटे कदमो से धीरे धीरे ओस पर पाँव रखना
धीमी सांस से रूह तक फूलों की महक भरना
चिड़ियों  की ध्वनि  से मन को तृप्त करना 
वृक्षों की सांय सांय से  देव वाणी ग्रहण करना 
मद्धम शीतल हवा से रुख को सहलाना

इस गली से आगे एक पथ ढूँढा  है

सब  को एक साथ चलना होगा 
कदम कदम माप कर रुख को बदलना होगा

हर कुषा को संभाल समेट सहलाना होगा
हर फूल को उसकी रंगत में बहलाना होगा
हर वृक्ष से नवजीवन को उद्दरण करना होगा 
हर झोंके में नया  स्वास भरना होगा 
हर पखेरू के स्वर को बहार बनाना होगा
हर ओस की बूँद को सागर बनाना होगा 
हमें  बच्चों  के लिए इस  पथ पर नया संसार बनाना होगा 

इस गली से आगे एक पथ ढूँढा है

आज इस गली से आगे निकल हमें जाना होगा
हमें अब पीढ़ियों के लिए यह पथ अपनाना होगा
धरती  को पुन: स्वर्ग बनाना होगा 
इस गली से आगे एक पथ ढूँढा  है

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

इम्तिहान

ज़िन्दगी  हर  कदम  एक  इम्तिहान  है 
हर लम्हा एक जंग
हर वक़्त एक खोज
हर दिन एक नयी पहचान है
ज़िन्दगी  हर  कदम  एक  इम्तिहान  है 

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

कभी तन्हाई में सुकून ढूंढते हैं
कभी काफिला बना लेते हैं
कभी महफ़िल में मिलेगी तस्सली
तो कभी जाम उठा लेते हैं
कभी अफताब को समझते हैं तेरा चेहरा
और कभी महताब सजा लेते हैं
जिगर को चैन जब कहीं नहीं मिलता
हम तेरी याद बुला लेते हैं.

सोमवार, 21 जून 2010

Subah

बागानों में बहारों में
खेतों में कलिहानो में
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण
चारों दिशाओं में 
शिखर पे और  सागर में  
अब शाम की लाली छायी है 
पर कल फिर सुबह होगी.

छुप गए सब पखेरू
सो गयीं सब कलियाँ
डूबता सूर्या अपनी लाली 
सिमटता कहीं दूर दिखता है
अंधियारी हो गयी सब गलियां
पर कल फिर सुबह होगी

निकल आये हैं सितारे 
अंधियारे को उजलाते
अपनी टिमटिमाती चमक
से आकाश को दमकाते
अन्धकार को सीमित कर दर्शाते
कल फिर सुबह होगी

चाँद भी खड़ा पथ्गीर बनकर
मंद प्रकाश बिखराता
पथ्गीरों को पथ दिखलाता  
वायु को शीतल कर जाता
यही समझाता 
कल फिर सुबह होगी

कभी प्रकाश के आगे
इक बादल भी आ जाता
चारों दिशाओं में अँधेरा छा जाता
तभी बरसती बूंदों से 
भू तर हो जाता 

इन्द्र धनुष अपने सातों
रंगों से नव सौंदर्य दिखलाता 
मन मोहित करता
और कहता है 
जीवन में सतरंगी सुबह होगी

शनिवार, 29 मई 2010

सपनो में मिली



कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

कभी फूलों की तरह खिली  
कभी मुस्कुराई  सी रहती
कभी शरमाई सी 
और कबी मुरझाई सी

कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

कभी सुबह को आँखें मलती  
कभी सुस्ती में सहलाती  
कभी जमाई में अंगड़ाई लेती
और कभी कर्वट बदलती

कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

थोडा सहमी थी कभी
थोडा रूकती थी कभी
कभी डर कर कदम थाम लेती
थोड़ी रुक कर राह पहचान लेती

कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

सुबह की किरणों सी चमकती 
सूरज की रौशनी सी दमकती
शीतल हवावाओं सी लहराती
मस्त बेलों सी बल खाती

कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

कभी फसलों सी लहराती 
कभी कलियों मुस्काती
कभी गुंचों सी खिलती 
कभी ओस सी चमचमती

कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

कभी बादलों सी गरजती
कभी टिमटिम बरसती
कभी क्षितिज को चमकाती 
कभी इन्द्रधनुषी रंगों से 
आकाश को भर जाती

कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

कभी समेटती हुई अपने तप को 
पश्चिम में लाली बिखराती
चन्द्र की शीतलता को फैलती 
सितारों की चादर बिछाती  

कई बार यूं ही वो मुझे सपनो में मिली 

नैनो की लाली को छुपाती
चक्शों को मुंदती जाती 
निद्रा की डोली में 
सजिया पे दुल्हन सी सो जाती

ऐसे ही 
कई बार यूं ही 
ज़िन्दगी
मुझे सपनो में मिली 

रविवार, 11 अप्रैल 2010

Sazaa

कभी रुख से नकाब हटा 

देते हैं लोग, 
हया का पर्दा उठा 
देते हैं लोग, 
दुश्मनों की क्या कहिये 
दोस्तों को भुला 
देते हैं लोग, 
बेरुखी का क्या आलम होगा, 
यहाँ प्यार करने की भी सजा, 
देते हैं लोग I

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

Sometimes I wont be around

Sometimes I won’t be around
Sometimes you won’t be there
Yet we will have these moments
In our hearts to share
Moments that brought us together
Moments of Happiness and Laughs
Moments of tears and sorrows
Moment when we thought 
there would be no tomorrow
Moments of long talks and words
The silent moments without words
But still with a lot said
Moments when there is music
Moments when there is a song
A poetry or a verse unsung
Moments of simple statements
Which we cherish and keep close to us
Moments of our walking together
Hands in hands sometimes
And others with one a few steps ahead
Moments when we would wait for each other
For we know the next moment is
Going to be a very special one
Moments of the long Drives in dark nights
Moments of holding hands while
Eyes are trying to decide which way to see
Those are the moments we share
Moments at the movie theatre where
We would lessen on the romance on the screen
Moments of when you would rest
Head on my shoulder and sleep
Moments when the eyes were closed
But we still saw each other
Moments we fought against time
Moments we fought for life
Moments we fought with each other too
Moments that really brought us together
Yet these moments are the most
Beautiful ones because they are
Between me and you
These are the moments we live
These are the moments we share
Sometimes I won’t be around
Sometimes you won’t be there
Yet we will have these moments
In our hearts to share.

रविवार, 4 अप्रैल 2010

मुस्कान

ये जो हल्की सी मुस्कान तुम्हारी
बालों में छुपी जाती है
मुझे बार बार बेलों में 
मुस्कुराते हुए मोतिये की याद दिलाती है l


खुशबु यूं ही ही तुम बिखेर देती हो सब के लिए 

पर फिर ये मुस्कान कम नहीं हो पाती है l


ये जो हल्की सी मुस्कान तुम्हारी ll


कभी अपनी पाक रंगत से 

खिला देती है  महफ़िल का यौवन
और कभी झुण्ड सी बन कर 
सजा जाती है श्रधा का चमन l


ये जो हल्की सी मुस्कान तुम्हारी l


कहीं कोमल पंखड़ियों को खिला कर
भर देती है  कोमल बचपन
और कभी सेज पे सज कर 
बन जाती है  नव जीवन का मधुबन l


ये जो हल्क्की सी मुस्कान तुम्हारी ll


सज्जा सँवरा रूप खिला कर
हो जाती है इश्वर को अर्पण
और कभी पिरोई माला बन कर 
खिला देती है  वीरों का दामन l


ये जो हल्क्की सी मुस्कान तुम्हारी ll

अपनी भीनी भीनी कुश्बू से
कभी तो ह्रदय को मोह जाती है 
और कभी रूह का रस बरसा कर
दुखों को धो जाती है l


ये जो हल्की सी मुस्कान तुम्हारी
बालों में छुपी जाती है
मुझे बार बार बेलों में 
मुस्कुराते हुए मोतिये की याद दिलाती है ll