सोमवार, 21 जून 2010

Subah

बागानों में बहारों में
खेतों में कलिहानो में
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण
चारों दिशाओं में 
शिखर पे और  सागर में  
अब शाम की लाली छायी है 
पर कल फिर सुबह होगी.

छुप गए सब पखेरू
सो गयीं सब कलियाँ
डूबता सूर्या अपनी लाली 
सिमटता कहीं दूर दिखता है
अंधियारी हो गयी सब गलियां
पर कल फिर सुबह होगी

निकल आये हैं सितारे 
अंधियारे को उजलाते
अपनी टिमटिमाती चमक
से आकाश को दमकाते
अन्धकार को सीमित कर दर्शाते
कल फिर सुबह होगी

चाँद भी खड़ा पथ्गीर बनकर
मंद प्रकाश बिखराता
पथ्गीरों को पथ दिखलाता  
वायु को शीतल कर जाता
यही समझाता 
कल फिर सुबह होगी

कभी प्रकाश के आगे
इक बादल भी आ जाता
चारों दिशाओं में अँधेरा छा जाता
तभी बरसती बूंदों से 
भू तर हो जाता 

इन्द्र धनुष अपने सातों
रंगों से नव सौंदर्य दिखलाता 
मन मोहित करता
और कहता है 
जीवन में सतरंगी सुबह होगी