रविवार, 4 अप्रैल 2010

मुस्कान

ये जो हल्की सी मुस्कान तुम्हारी
बालों में छुपी जाती है
मुझे बार बार बेलों में 
मुस्कुराते हुए मोतिये की याद दिलाती है l


खुशबु यूं ही ही तुम बिखेर देती हो सब के लिए 

पर फिर ये मुस्कान कम नहीं हो पाती है l


ये जो हल्की सी मुस्कान तुम्हारी ll


कभी अपनी पाक रंगत से 

खिला देती है  महफ़िल का यौवन
और कभी झुण्ड सी बन कर 
सजा जाती है श्रधा का चमन l


ये जो हल्की सी मुस्कान तुम्हारी l


कहीं कोमल पंखड़ियों को खिला कर
भर देती है  कोमल बचपन
और कभी सेज पे सज कर 
बन जाती है  नव जीवन का मधुबन l


ये जो हल्क्की सी मुस्कान तुम्हारी ll


सज्जा सँवरा रूप खिला कर
हो जाती है इश्वर को अर्पण
और कभी पिरोई माला बन कर 
खिला देती है  वीरों का दामन l


ये जो हल्क्की सी मुस्कान तुम्हारी ll

अपनी भीनी भीनी कुश्बू से
कभी तो ह्रदय को मोह जाती है 
और कभी रूह का रस बरसा कर
दुखों को धो जाती है l


ये जो हल्की सी मुस्कान तुम्हारी
बालों में छुपी जाती है
मुझे बार बार बेलों में 
मुस्कुराते हुए मोतिये की याद दिलाती है ll

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