मंगलवार, 30 नवंबर 2010

तुम बहुत करीब हो 
मगर पास नहीं
तुम्हें देख सकते हैं 
मगर छूने का अहसास नहीं
तुम बहुत करीब हो 
मगर पास नहीं
माना के हर कतरे में
हो तुम एक समुन्दर की तरह
माना के हर कतरे में
हो तुम एक समुन्दर की तरह
पर समुन्दर से बुझती कभी
प्यास नहीं
तुम बहुत करीब हो 
मगर पास नहीं
दर्द की दीवारों से 
घिरा है अंजुमन
दर्द की दीवारों से 
घिरा है अंजुमन
तोड़ पाएं इन दीवारों को 
हमें आस नहीं
तुम बहुत करीब हो 
मगर पास नहीं
दिल कहाँ और 
नसीब कहाँ
दिल कहाँ और 
नसीब कहाँ 
कभी मिल पायेगा मुकद्दर
है अहसास नहीं 
तुम बहुत करीब हो 
मगर पास नहीं
नज़दीक गर न आ 
पाए कभी
नज़दीक गर न आ
पाए कभी
देख कर दूर से सजदा करें 
यही आभास सही
तुम बहुत करीब हो 
मगर पास नहीं

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