बुधवार, 24 मार्च 2010

मेरी पहली Face Book महफ़िल

मुझसे  बिछड़ के खुश रहते  हो 

मेरी तरह तुम भी झूठे हो .... रोमा 



ख़ुशी वो अहसास नहीं है जो खो  जाती  है
हमें तो तेरी यादों में भी वो ही महक आती  है .... नितेन 



तुझ को पा के दिल को कभी चैन ना मिल सका 

कितना सकूं हाय उन जुदाइयों मैं  था  .... रोमा 


मृग की तृष्णा उसे कभी सुकून नहीं  देती
कस्तूरी उसके पास है उसे भी अहसास  नहीं ..नितेन


मैं तो मदहोश थी कुछ इतनी उसकी चाहत में 

उसने कब छोड़ दिया साथ मेरा मुझे याद नहीं .... रोमा



पतंग की डोर को चूड़ी में लपेटा था?
जब टूटी तो धागा ही काट दिया,
और हम पर इलज़ाम जुदाई का
जब आपकी कलाई ने ही ना आपका साथ दिया l .. नितेन 

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